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कोविड-१९ एक आत्मनिरीक्षण

✍️विशेष आलेख:मिर्ज़ा फ़ातिमा कामरान बैग, मुंबई

कोरोना वायरस या कॉविड-१९ ने पिछले ६ महीनों से पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है । दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक और डॉक्टर्स अब तक इस वायरस के संक्रमण को रोकने वाला कोई टीका नही बना पाए हैं । इस वायरस ने अब तक लगभग दुनिया के ३५ फीसदी से ज़्यादा लोगों को संक्रमित किया है । दुनिया के बड़े बड़े देशों की अर्थव्यवस्था, जी डी पी नकारात्मक संख्या में आ रही है, सिर्फ़ इस वायरस के कहर से !

इस महामारी ने मानव अस्तित्व को एक धमाकेदार गड़गड़ाहट में बदल दिया है । हम सभी घर की चार दीवारों में बंद से हो गए हैं, बाहरी दुनिया हम सब की सीमा के बाहर सी हो गई है । जीवन हमारे भौतिक अस्तित्व के मामले में आगे बढ़ चुका है, लेकिन जीवन भौतिक अस्तित्व से . अधिक है । प्रकृति आज के समय में वास्तविक दुनिया में मनुष्यों को नकार रही है । तो इंसानों ने क्या किया ? वे उन्हें सड़क पे पाने की कोशिश कर रहे हैं, अपनी वास्तविकता को बदल कर , वास्तविकता में नहीं बल्कि डिजिटल दुनिया में । मानव को छूने और अपने स्वयं के दूसरों के साथ बातचीत की तलाश की ज़रूरत है उनके आसपास की दुनिया के बारे में जानने के लए जिज्ञासा अचानक काट दि गई है । इंसान अपने प्रियजंनो, दोस्तों, परिवार, स्कूल, कार्यालय की असली दुनिया से वंचित हो गया है । इस छोटे से वायरस ने जैसे पूरी दुनिया को एक विराम सा लगा दिया है ।

असली दुनिया डिजिटल दुनिया के साथ प्रतिस्थापित हो चुकी है । केवल डिजिटल रूप से संपर्क में रहने की दुनिया, एक वीडियो कॉल एमोजी, चैटिंग आदी यही सब ज़राएं हैं इस कोरोना काल में । हम वास्तविक दुनिया में प्रशंसा और आत्‍मसम्मान के लए तरस गए हैं, ऑफ़िस में बॉस की बातें, विद्यालय में शिक्षक की डाँट, सहकर्मियों से गप्पे, प्रयोजनों से मुलाक़ात… कोविड-१९ ने बेरेहमी से ये सब छिन लिया है । हम सब इस ज़रूरत के लिए डिजिटल रूप से पर्याप्त करने की कोशिश कर रहे हैं । इस मुश्किल समय में सोशियल मीडीया पर पहले से ज़्यादा लोग पोस्ट करने लगे हैं । असली दुनिया के अभाव भरने के लिए लोग सख़्त आश्वासन और अपने डिजिटल दोस्तों से प्रशंसा की माँग कर रहे हैं । लोग सोशियल मीडीया पर लाईक्स, कॉमेंट्स और इस तरह के बाक़ी ऑनलाइन चीज़ों की मदद से जीने का प्रयास कर रहे हैं ।

क्या ये डिजिटल दुनिया एक नई वास्तविकता है ? नहीं, हर गिज़ नहीं, डिजिटल वर्ल्ड कभी वास्तविक ज़िंदगी की जगह नहीं ले सकता है । और ये सिर्फ़ इसलिए क्योंकि इंसान मशीन नहीं है, आभासी दुनिया वास्तविक दुनिया की धारणाओं और अनुभवों को नहीं दे सकती है । स्पर्श और गंध की भावना डिजिटल वर्ल्ड में एकदम अनुपस्थित है । हम माँ के हाथों के पराठे वीडियो कॉल पे नहीं खा सकते और ना ही वीडियो में किसी अपने के कंधे पर हाथ रखकर, गले लगाकर रो सकते हैं इस दौर में । ना हम बाग़ के फूलों की महक का आनंद ले सकते हैं ।आज के तकनीकी दौर में यह चीज़ें प्रतिस्थापित नहीं की जा सकतीं । आप क्या कहते हैं ?

हमें इन सारी चीज़ों का आत्मविश्लेषण करने की ज़रूरत है । मानव कितना बेबस, लाचार, परेशान है, इस दौर में दूसरों पर निर्भर रहने पर मजबूर हो चूका है । एक आशा है की, हम जल्द ही वास्तविक दुनिया में लौटेंगे, एक दूसरे की मदद करने के लिए ज़रूर बाहर निकलेंगे । लेकिन इसके लिए ज़रूरी है अपने ईश्वर की तरफ लौटने की, झुकने की, और मानवता के लिए खड़े होने की । इस नाज़ुक वक़्त में जमात-ए-इस्लामी हिंद, मुंबई ने १० दिन की एक मुहिम आयोजित की है “टर्न टू द क्रियेटर” जिसमें अपने ईश्वर की तरफ़ पलटने का बेहतरीन संदेश दिया जा रहा है । इस मुहिम में मुंबई ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी लोग हिस्सा लेंगे, विभिन्ना प्रोग्रामो कार्यक्रमों के ज़रिए ये संदेश दिया जाएगा । ज़रूरत हमे आत्मनिरीक्षण करने की है इन कमज़ोर और नाज़ुक हालात में ।

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