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कोरोना वायरस से लड़ने में कितने ज़रूरी हैं वेंटिलेटर्स

भारत में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं. यहां अब तक 1400 से ज़्यादा लोगों में सक्रमण की पुष्टि हुई है और 35 की मौत हो चुकी है.

दिल्ली में निज़ामुद्दीन की मरकज़ बिल्डिंग में तबलीग़ी जमात के सैकड़ों लोग मिलने के बाद से मामला और गंभीर हो गया है.यहां पर 1500 से 1700 लोग मौजूद थे जिनमें से कई लोगों में कोरोना वायरस जैसे लक्षण पाए गए हैं.

इस घटना से कोरोना वायरस का संक्रमण और बढ़ने का ख़तरा पैदा हो गया है.

सरकार लगातार संक्रमण के तीसरे चरण यानी कम्यूनिटी ट्रांसमिशन को रोकने की कोशिश कर रही है. इसके लिए भारत में 21 दिनों का लॉकडाउन भी किया गया है.

वेंटिलेटर की व्यवस्था

इसके साथ ही मेडिकल उपकरणों की कमी को भी पूरा किया जा रहा है. कोरोना वायरस के गंभीर मामलों को देखते हुए वेंटिलेटर की व्यवस्था भी की गई है.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को 30,000 वेंटिलेटर तैयार करने का ऑर्डर दिया गया है.

वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक देश के विभिन्न अस्पतालों में मौजूद वेंटिलेटर्स में से 14,000 से ज़्यादा कोविड-19 मरीज़ों के लिए लगाए गए हैं.

जिन मरीज़ों की हालत गंभीर होती है वेंटिलेटर उनकी जान बचाने में मदद करता है. वेंटिलेटर की ज़रूरत कब पड़ती है और आने वाले समय में भारत इसकी आपूर्ति के लिए कितना तैयार है?

कोरोना वायरस से संक्रमण के गंभीर मामलों में वायरस फेफड़ों को नुक़सान पहुंचाने लगता है. इंसान के फेफड़े शरीर में वो जगह हैं जहां से ऑक्सीजन शरीर में पहुंचना शुरू होती है और कार्बन डाई ऑक्साइड शरीर से बाहर निकलती है.

अगर ये वायरस आपके मुंह से होते हुए सांस की नली में प्रवेश करता है और फिर आपके फेफड़ों तक पहुंचता है तो आपके फेफड़ों में छोटे-छोटे एयरसैक बना देता है.

कोरोना के बनाए छोटे-छोटे एयरसैक में पानी जमने लगता है. इस कारण सांस लेने में तकलीफ़ होती है और आप लंबी सांस नहीं ले पाते.

इस स्टेज में मरीज़ को वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ती है. ऐसे में वेंटिलेटर फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाता है. वेंटिलेटर में ह्यूमिडीफायर भी होता है जो हवा में गर्माहट और नमी शामिल करता है और उससे शरीर का तापमान सामान्य बना रहता है.

इंडियन सोसाइटी ऑफ़ क्रिटिकल केयर मेडिसिन के महासचिव डॉक्टर श्रीनिवास समावेदम बताते हैं कि भारत में सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में इस वक्त 80 हज़ार से एक लाख तक वेंटिलेटर हैं.

डॉक्टर श्रीनिवास का कहना है, “अगर इटली, सऊदी अरब की रफ़्तार से यहां भी बीमारी आगे बढ़ी तो मौजूदा वेंटिलेटर्स की संख्या कम पड़ सकती है. लेकिन, भारत में ऐसा नहीं लग रहा है. अभी जो आंकड़ा है उसके हिसाब से यहां पर्याप्त वेंटिलेटर्स हैं. जब ये आंकड़ा 10 हज़ार या 20 हज़ार पहुंचेगा तब थोड़ा चिंता की बात होगी.”

“लेकिन, जिस तरह सरकार ने लॉकडाउन किया है और लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं तो इस आंकड़े तक पहुंचने में दो-तीन हफ़्ते का वक़्त लगेगा और इस बीच सरकार को ज़रूरी उपकरणों की आपूर्ति का समय मिल जाएगा. वैसे ज़रूरी भी नहीं भारत में आंकड़ा इतना ज़्यादा हो जाए. हालांकि, इस बीच पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट, मास्क, वेंटिलेटर की आपूर्ति की कोशिश करनी चाहिए।

कोरोनावायरस किस तरह एक से दूसरे को फैलता है और सतह पर ये कितनी देर तक ज़िंदा रह सकता है?

अमूमन लोगों के बीच वेंटिलेटर को लेकर डर होता है. ये धारणा होती है कि वेंटिलेटर से लौट कर आना बेहद मुश्किल है.कोरोना वायरस के मामले में वेंटिलेटर पर पहुंचने के बाद क्या संभावना होती है.

डॉक्टर श्रीनिवास कहते हैं कि वेंटिलेंटर पर आने के बाद भी मरीज़ ठीक होते हैं.कोरोना वायरस के अलावा दूसरी बीमारियों में तो 70 से 85 प्रतिशत मरीज ठीक होकर निकलते हैं. कोरोना वायरस में ये प्रतिशत थोड़ा कम होता है.

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