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खुश रहने के सिद्धांत।

कहते हैं एक मर्तबा दो बंदरों को एक ही पिंजरे के अलग अलग ख़ानों में बंद किया गया दोनों को बराबर मिक़दार में वक़्त पर खाना दिया जाताथा, उनके ख़ानों में कुछ ब्लॉक्स रख दीए गए एक आदमी आता बंदरों से बलॉक मांगता अगर वो बलॉक दे देता तो उन्हें इनाम के तौर पर मूंगफली दे देता ।ये मूंगफली के दाने उन्हें ज़ाइद/extra इनाम के तौर पर दीए जाते थे ,बंदरों को अब उस की आदत हो गई थी , अब एक नया तजुर्बा किया गया बंदरों से बलॉक मांगा जाता जैसे ही एक बंदर बलॉक देता उसे मूंगफली दी जाती लेकिन दो सर से बंदर को मूंगफली के बजाय इनाम में केला दिया जाने लगा, ये देखकर पहले वाला बंदर बेचैन हो गया ग़ुस्सा दिखाने लगा, जब ये सिलसिला दराज़ हुआ तो देखा गया कि पहला बंदर उदास रहने लगा ।हालाँकि पहले बंदर को दूसरे की तरह पेट भर कर खाना दिया जा रहा था और एक ज़रा सा काम करने पर मूंगफली भी मिल रही थी लेकिन दूसरे वाले बंदर से तक़ाबुल करने की वजह से वो ख़ुश नहीं रह पारहा था। हमारी ख़ुशीयों पर डाका डालने वाली पहली वजह तक़ाबुल है।

टैक्नालोजी के इस दौर ने हमारी ज़िंदगी को आसान बनादिया है, पहले हम किसी की ख़ैर ख़ैरीयत जानना चाहते तो उसे ख़त लिखना पड़ता था,मेरे जैसे आदमी के लिए ख़त लिखना फिर भी आसान था लेकिन उसे पोस्ट बॉक्स में डालना एक बड़ा चैलेंज हुआ करता था लेकिन अब तो हम एक दूसरे के बहुत क़रीब हो गए हैं, बल्कि हरदम एक दूसरे के ‘टच मैं रहते हैं। इसी तरह कहीं आना जाना और सफ़र करना भी आसान हो गया है। टैक्नालोजी ने ज़िंदगी को पहले के मुक़ाबले में ज़्यादा आसान और पुर-लुत्फ़ बना दिया है, लेकिन दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि लोग पहले के मुक़ाबले में ज़्यादा उदास रहते हैं, बहुत कम लोग हैं जो ख़ुश रहते हैं। आईए हम देखें कि तक़ाबुल के इलावा और कौनसी वजूहात हैं जो हमारी ख़ुशीयों पर डाका हैं।

▪दूसरी वजह ना’शुकरा पन है , अल्लाह ने जो कुछ हमीं दिया है इस पर तवज्जा करने कि बजाय जो चीज़ हासिल नहीं है इस पर तवज्जा करने से भी आदमी उदास रहता है ,एक सर्वे के मुताबिक़ हिन्दोस्तान में20 करोड़ लोग ख़ाली पेट सोते हैं, अगर अल्लाह ने आपको एक ठीक ठाक नौकरी , रहने के लिए घर और एक अदद बाइक अता फ़रमाई है तो ये भी ख़ुश रहने और शुक्र अदा करने के लिए काफ़ी है। अल्लाह ताला ने हमें खाने पीने को दिया उस का शुक्र अदा करना चाहीए।जब आदमी को अपने पास मौजूद नेअमतों का एहसास हो तब ही वो उनसे ज़्यादा लुतफ़ अंदोज़ हो सकता है और अहम बात ये ही कि आप जिस चीज़ पर तवज्जा ज़्यादा देंगे वो बढ़ जाती हैं आप अपनी महरूमियों पर ज़्यादा तवज्जा देंगे तो महरूमियाँ बढ़ेंगी उस के बरअक्स अगर आप नेअमतों पर तवज्जा देंगे तो नेअमतें बढ़ेंगी

▪तीसरी वजह है गोशा-ए-आफ़ियत(कम्फर्ट ज़ोन मैं रहना, जो लोग गोशा आफ़ियत में रहते हैं उनकी ज़िंदगी में तरक़्क़ी ख़त्म होजाती है, जहां प्रोग्रेस और सीखने का जज़बा ख़त्म होजाता है वहां ज़िंदगी का लुतफ़ कम हो जाता है , बाक़ौल इक़बाल

हयात क्या है , ख़्याल-ओ-नज़र की मजज़ूबी!
ख़ुदी की मौत है अंदेशा हाय गूना-गूं

बाअज़ लोग समझते हैं कि उन्हें जो करना है इस का मुनासिब वक़्त नहीं आया है, या ये कि अगर कुछ करूँ और फ़ेल हो गया तो बहुत बद-नामी होगी , ये और इसतरह के अंदेशे और अंदेशों में गिरफ़्तार लोग धीरे धीरे उदास रहने लगते हैं

▪चौथी वजह अपने जिस्म को हरकत ना देना है, बहुत ज़्यादा आसाइश और आरामदेह ज़िंदगी गुज़ारने की वजह से थकान नहीं होती है ओर थकान ना होने की वजह से भरपूर नींद से हम महरूम होजाते हैं मुनव्वर राणा के बाक़ौल

सो जाते हैं फ़ुट-पाथ पे अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते

इन्सानी नफ़स में तीन चीज़ें बड़ी अहम हैं एक आराम दूसरा भूक और तीसरी चीज़ जिन्सी ख़ाहिश , इन तीनों चीज़ों की ज़्यादती इन तीनों से इन्सान को मुतनफ़्फ़िर कर देती है। मसलन भूक हो तो ही खाने का मज़ा आता है, भूक लगने से पहले खाने की आदत हो तो आदमी भूक की नेअमत से महरूम होजाता है और जब भूक ही ना लगे तो खाना कैसा? खाना बे-लुत्फ़ होजाता है,शाएद इसी लिए कहा गया हैली भूक रखकर दस्तर ख़वान से उठना चाहीए।वैसा ही आराम पसंदी और जिन्सी ज़िंदगी का मुआमला है ।अगर आप उनसे ज़्यादा लुतफ़ अंदोज़ होना चाहते हैतो उसकी कसरत से बचें ज़िंदगी पुर-लुत्फ़ हो जाएगी।

▪पांचवी वजह ये है कि आप या तो माज़ी में रहते हैं या मुस्तक़बिल में हाल में नहीं रहते , जो लोग माज़ी के ख़्यालात में होते हैं उन्हें डिप्रेशन होजाता है और जो लोग मुस्तक़बिल में रहते हैं वोAnxiety का शिकार होजाते हैं। एक औसत इन्सानी दिमाग़ में एक दिन में 60हज़ार ख़्यालात आते हैं इन में से 95फ़ीसद ख़्यालात रीपीट होते हैं, लोग आम तौर पर या तो माज़ी के ख़्यालात में गुम होते हैं या मुस्तक़बिल में, उन्हें हाल की ख़बर ही नहीं होती , और इस तरह ज़िंदगी बे-ख़बरी में गुज़रती जाती है , जो लोग हाल में जीते हैं वो हर चीज़ का लुतफ़ लेते हैं यहां तक कि अगर उन पर मुसीबतें भी आती हैं तो कहते हैं
आज़माइशें ऐ दिल सख़्त ही सही लेकिंन
ये नसीब क्या कम है कोई आज़माता है

माज़ी या मुस्तक़बिल के ख़्यालात में रहने की वजह से हाल में कोई काम नहीं हो पाता है और आदमी का माज़ी मज़ीद बदतर और मुस्तक़बिल तारीक होता जाता है। हाल में रहने के लिए आदमी का पूर सुकून होना ज़रूरी है । पुरसुकून होने के लिए ज़रूरी है कि आप मनफ़ी/negative ख़बरों और मनफ़ी सोच रखने वाले अफ़राद से रहें।

ख़ुश रहें , ख़ुशीयां बाँटते रहीं 😊💐

सय्यद मुइज़ अलरहमान, नांदेड़
moiz1982@gmail.com
[हफ़तरोज़ा दावत,
शुमारा 29 मार्च ता 4 अप्रैल 2020]

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