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झारखंड में भूख से मौतों पर सर्वे रिपोर्ट से साफ, रघुवर दास ही हैं असली गुनहगार

झारखंड की पूर्ववर्ती रघुवर दास सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान लाखों राशन कार्डों को फर्जी बता कर रद्द कर दिया था। सरकार ने तब कहा था कि इन कार्डों के जरिये लोग अवैध तरीके से राशन उठा रहे थे। जिस वक्त यह कार्रवाई की गई, लगभग उन्हीं दिनों राज्य में कई लोगों की मौत भरपेट भोजन नहीं मिल पाने के कारण हो गई। तब भूख से हुई मौतें सुर्खियों में भी रहीं। इसके बावजूद सरकार ने इन मौतों की वजह बीमारी बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया।

हालांकि, उसी दौरान मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की तहकीकात में यह बात स्पष्ट हुई कि मरने वाले हर व्यक्ति के घर में अनाज नहीं था। इस कारण खाना नहीं बन पा रहा था और वे भूख से मर गए। अब मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और सोशल एक्टिविस्ट रितिका खेड़ा की टीम ने एक सर्वे के बाद दावा किया है कि तब रघुवर सरकार द्वारा रद्द किए गए 90 फीसदी राशन कार्ड फर्जी नहीं थे। सरकार ने उन्हे गलत तरीके से कैंसिल किया था।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रघुवर दास तब लोगों की भूख से हुई मौतों के इकलौते गुनाहगार हैं। इसको ऐसे समझिए 21 मार्च, 2017 को तत्कालीन मुख्य सचिव ने एक आदेश जारी कर कहा कि जिन राशन कार्डों को आधार नंबर से नहीं जोड़ा गया है, उन्हें 5 अप्रैल से अमान्य करार दे दिया जाएगा।

इसके बाद 22 सितंबर को सरकार ने अपने 1,000 दिनों की सफलता पर एक पुस्तिका जारी की। इसमें दावा किया गया कि राज्य में राशन कार्डों की आधार सीडिंग का काम शुरू हो चुका है। इस प्रक्रिया में 11 लाख 64 हजार फर्जी राशन कार्ड पाए गए हैं। इसके माध्यम से राज्य सरकार ने एक साल में 225 करोड़ रुपये बचाए हैं। इसका उपयोग गरीबों के विकास के लिए किया जा सकता है।

तब यह भी कहा गया कि 99 प्रतिशत राशन कार्डों की आधार के साथ सीडिंग कर ली गई है। इसके कुछ ही दिनों बाद 10 नंवबर को राज्य सरकार के खाद्य और आपूर्ति विभाग ने स्पष्ट किया कि हटाए गए राशन कार्डों की संख्या दरअसल 6.96 लाख थी, न कि 11.64 लाख। रद्द कार्डों को सरकार ने तब फर्जी बताया था।

इसी बीच 28 सितंबर, 2017 को सिमडेगा जिले के कारीमाटी गांव में संतोषी कुमारी नामक एक 11 साल की बच्ची की मौत भूख के कारण हो गई। तब उसके भात-भात कहकर मरने की खबरें अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में रहीं। उसके घर के राशन कार्ड की आधार सीडिंग नहीं होने के कारण इस परिवार को एक रुपये प्रति किलो मिलने वाला चावल नहीं मिल पा रहा था। उसकी मां कोयली देवी राशन के लिए कई बार चक्कर काट चुकी थी, लेकिन अंगूठे का मिलान नहीं होने के कारण उन्हें राशन नहीं मिला और संतोषी की मौत हो गई। जब वह मरी, तब कोयली देवी के घर में अन्न का एक दाना भी मौजूद नहीं था।

यह राज्य में भूख से होने वाली पहली चर्चित मौत थी। उसके बाद से साल 2019 में हुए चुनाव में रघुवर दास सरकार की हार तक राज्य में कम-से-कम 18 लोगों की मौत भूख से हुई। इनमें से अधिकतर लोग आदिवासी या दूसरे वंचित समुदायों के थे। इनकी मौतों का कारण राशन नहीं मिलना था। इनके राशन कार्ड या तो रद्द कर दिए गए थे या फिर, इन्हें किसी तात्कालिक कारण का हवाला देकर राशन नहीं दिया जा रहा था। इस कारण उनके घरों में खाना नहीं बन पा रहा था। अंततः उनकी मौत बगैर खाए हो गई।

ताजा सर्वे का खुलासा

मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और रितिका खेड़ा ने कार्तिक मुरलीधरन, पालनी हाउस, संदीप सुखटणकर जैसे अर्थशास्त्रियों की मदद से झारखंड में सर्वे करने के बाद दावा किया है कि साल 2016 से 2018 के बीच रद्द किए गए 90 फीसदी राशन कार्ड फर्जी नहीं थे, जैसा तत्कालीन रघुवर दास सरकार ने दावा किया था। यह सर्वे राज्य के 10 जिलों में रेंडम तौर पर किया गया।

ज्यां द्रेज ने नवजीवन को बताया कि अध्ययन टीम ने शोध के लिए तय जिलों का चुनाव रेंडम तौर पर किया। चुने गए जिलों में उस दौरान 1.44 लाख राशन कार्ड रद्द किए गए थे। उन्हें फर्जी बताया गया था। इनमें से 56 प्रतिशत कार्ड आधार से नहीं जुड़े थे। उन्होंने बताया कि रद्द किए गए राशन कार्डों में से रेंडम तौर पर चुने गए 4000 राशन कार्डों की जांच के बाद शोध टीम ने पाया कि इनमें से सिर्फ 10 फीसदी ही फर्जी निकले। इनके परिवारों का पता नहीं चल सका। ऐसे में तत्कालीन सरकार की वह कार्रवाई एक चूहे को पकड़ने के लिए पूरा घर जला देने-जैसी थी। बकौल ज्यां द्रेज, सरकार को उस दौरान की गई सभी कवायदों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि लोग यह जान सकें कि सरकार ने किस आधार पर उन राश कार्डों को रद्द किया था।

तत्कालीन खाद्य मंत्री का ट्वीट

तब खाद्य और आपूर्ति मंत्री रहे और बाद में रघुवर दास के खिलाफ चुनाव लड़कर उन्हें हराने वाले सरयू राय ने इस सर्वे के बाद ट्वीट कर कहा कि वह राशन कार्डों को रद्द करने के पक्ष में नहीं थे। अब मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार को इसकी जांच करानी चाहिए कि राशन कार्डों की आधार सीडिंग कराने और उन्हें रद्द करने की पहल किसने की थी। उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

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